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सुन्नी अवधारणाओं का सारांश

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ईश्वर का दृष्टिकोण वह है जो इस दुनिया और उसके बाद के जीवन के दो मार्गों को जोड़ता है

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मूल मानव जीवन की प्रकृति में है

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कि इस लोक का मार्ग और परलोक का मार्ग मिलते हैं

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यह विश्व की भलाई का मार्ग होगा

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यह परलोक की भलाई का भी वही मार्ग है

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भूमि के कार्य में उत्पादन, वृद्धि एवं प्रचुरता

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वह स्वयं ही परलोक का प्रतिफल पाने के योग्य है

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वह इस सांसारिक जीवन की समृद्धि के लिए भी योग्य है

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आस्था, धर्मपरायणता और अच्छे कर्म

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वे ही इस भूमि के निर्माण के कारण हैं

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वे परलोक में ईश्वर की प्रसन्नता और प्रतिफल प्राप्त करने के साधन भी हैं

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यही मानव जीवन के स्वभाव का मूल है

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जो तभी प्राप्त होता है जब जीवन होता है

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परमेश्वर के उस तरीके पर जो उसने लोगों पर प्रसन्न किया है

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यह वह दृष्टिकोण है जो काम को पूजा में बदल देता है

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ईश्वर के कानून के अनुसार पृथ्वी पर खिलाफत अनिवार्य है

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खिलाफत का अर्थ है कार्य, उत्पादन, प्रचुरता और विकास

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और सभी के लिए आजीविका के वितरण में न्याय

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और लोग जगत् के प्रभु की आराधना करते हैं
